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गोधराकांड : 11 दोषियों की फांसी की सजा उम्रकैद में तब्दील

 मृतकों के परिजनों को 10-10 लाख का मुआवजा देने का आदेश

अहमदाबाद (ईएमएस)| गुजरात हाईकोर्ट ने आज वर्ष 2002 में राज्यभर में हाहाकार मचाने वाले गोधरा रेल अग्निकांड के 11 दोषियों की फांसी उम्रकैद में तब्दील कर दी| जबकि अन्य 20 दोषियों आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी है|

गुजरात हाईकोर्ट ने 15 साल पुराने गोधरा रेल अग्निकांड में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सभी दोषियों को उम्र कैद की सजा सुनायी है| इस मामले में हार्इकोर्ट ने 11 दोषियों की फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया है| वहीं 20 लोगों के आजीवन कारावास को हार्इकोर्ट ने जारी रखा है| इस मामले में निचली अदालत ने 31 लोगों को दोषी करार देते हुए 11 लोगों को फांसी की सजा सुनायी थी| हार्इकोर्ट ने एसआईटी की विशेष अदालत की ओर से मामले में आरोपियों को दोषी ठहराये जाने के फैसले को चुनौती देने वाली अपीलों पर फैसला दिया है| ट्रायल कोर्ट में दोषी ठहराये गये इन आरोपियों का कहना था कि उन्हें न्याय नहीं मिला है| उन्होंने हाईकोर्ट में अपील की थी|

साल 2002 में अंजाम दी गयी इस वारदात की न्यायिक प्रक्रिया में सेशन कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक शामिल रहे| निचली अदालत ने बिलाल इस्माइल उर्फ हाजी बिलाल, अब्दुल रजाक कुरकुर, रमजानी बिन यामिन बेहरा, हसन अहमद चरखा, जाबिर बिनयामिन बहेरा, मेहबूब चंदा, सलीम युसूफ जर्दा, ससिराज महमद मेडा, इरफान कलंदर, इरफान पातलिया और मेहबूब हसन लतिको को फांसी की सजा सुनाई थी| जबकि सुलेमान अहमद हुसैन, अब्दुल रहमान धंतिया, कासिम अब्दुल सार बिरयानी, शौकत मौलवी इस्माइल बदाम, अनवर अहमद मेहडा उर्फ लालू, सिद्दीक माटुंगा, मेहबूब याकूब मीठा उर्फ पोपा, शोहेब युसूफ अहमद कलंदर, अब्दुल सार पातलिया, सिद्दीक महमद मोरा, अब्दुल रउफ उर्फ घडियाली, इब्राहिम अब्दुल रजाक समोल उर्फ भाणो, बिलाल अब्दुल्ला बदाम, हाजी भूरियो उर्फ फारूक, अयूब अब्दुल गनी इस्माइल पातलिया, इरफान सिराज पाडो घांची, महमद हनीफ मौलवी इस्माइल बदाम और शौकत युसूफ मोहन को उम्रकैद की सजा दी थी|

गुजरात हाईकोर्ट ने आज निचली अदालत के 11 दोषियों की फांसी को उम्रकैद में तब्दील कर दिया है| यानि गोधरा रेल अग्निकांड में अब किसी को फांसी नहीं होगी| गुजरात हाईकोर्ट ने गोधरा रेल अग्निकांड के मृतकों के परिजनों को रु. 10-10 लाख का मुआवजा देने का भी आदेश दिया है|27 फरवर 2002 को गोधरा रेलवे स्टेशन के पास साबरमती ट्रेन के एस-6 कोच में लगी आग में 59 कारसेवकों की मौत हो गयी थी| जिसमें 23 पुरुष, 15 महिला और 20 बच्चे शामिल थे| इस मामले में करीब 1500 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गयी| आरोप था कि इस ट्रेन में भीड़ ने पेट्रोल डालकर आग लगा दी थी, जो गोधरा कांड की जांच कर रहे नानावटी आयोग ने भी माना है|

रेल अग्निकांड के बाद गुजरातभर में सांप्रदायिक दंगा भड़का और उसमें सैंकड़ों लोगों की मौत हो गई थी| आग लगाने को लेकर कई लोगों को गिरफ्तार किया गया| ट्रेन जलाने के मामले में गिरफ्तार किये गये लोगों के खिलाफ आतंकवाद निरोधक अध्यादेश यानि पोटा लगाया गया| हालांकि उसे बाद में हटा भी लिया गया था| दंगों के बाद सरकार ने ट्रेन में आग लगने और उसके बाद हुए दंगों की जांच करने के लिए एक आयोग नियुक्त किया. उसके बाद पुलिस ने सभी आरोपियों के खिलाफ आपराधिक षड़यंत्र का मामला दर्ज कर दिया| केंद्र सरकार के दबाव में 3 मार्च 2002 को आरोपियों पर लगाये गये पोटा को हटा लिया गया|

वर्ष 2003 में एक बार फिर आरोपियों के खिलाफ आतंकवाद संबंधी कानून लगा दिया गया| बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कोई भी न्यायिक सुनवाई होने पर रोक लगा दी थी. साल 2004 में यूपीए ने सरकार बनायी और पोटा कानून के खत्म कर दिया| जनवरी 2005 में जांच कर रही यूसी बनर्जी समिति ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में बताया कि एस-6 में लगी आग एक दुर्घटना थी इस बात की आशंका को खारिज किया कि आग बाहरी तत्वों द्वारा लगायी गयी थी| वर्ष 2006 में गुजरात हाईकोर्ट ने यूसी बनर्जी समिति को अमान्य करार देते हुए उसकी रिपोर्ट को भी ठुकरा दिया, जिसमें कहा गया था कि आग सिर्फ एक दुर्घटना थी| उसके बाद 2008 में एक जांच आयोग बनाया गया और नानावटी आयोग को जांच सौंपी गयी, जिसमें कहा गया था कि आग दुर्घटना नहीं बल्कि एक साजिश थी|

जनवरी 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले में न्यायिक कार्रवाई करने को लेकर लगायी रोक हटा ली| फरवरी 2011 में विशेष अदालत ने गोधरा कांड में 31 लोगों को दोषी पाया, जबकि 63 अन्य को बरी किया|
मार्च 2011 में विशेष अदालत ने गोधरा कांड में 11 को फांसी, 20 को उम्रकैद की सजा सुनायी. इसके बाद साल 2014 में नानावटी आयोग ने 12 साल की जांच के बाद गुजरात दंगों पर अपनी अंतिम रिपोर्ट तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को सौंप दी थी|

 

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