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मतिभ्रम का शिकार कौन?

शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी पर निशाना साधा है। राहुल के प्रति ठाकरे की खीझ स्वाभाविक है। इसी के चलते उनकी कलम अनियंत्रित हो गई। ठाकरे ने अपने अखबार 'सामना' में लिखा है कि कांग्रेस की अक्ल का दिवाला निकल गया। कांग्रेस के युवराज के सिर पर सींग ड्डूट आए हैं। उम्र होने पर विवाह नहीं होने पर व्यक्ति भ्रमित हो जाता है। ठाकरे ने राहुल गांधी की मां सोनिया गांधी को भी नहीं बख्शा। उन्होंने कहा, '' मुंबई सभी भारतीयों की हो सकती है पर वह इटालियन मम्मी की कैसे हो सकती है?'' दो दिन पूर्व राहुल गांधी ने मुंबई के संदर्भ में जो टिप्पणी की थी उसने ''ठाकरों' को तिलमिला डाला। मराठी और महाराष्ट्र के नाम पर अपनी राजनीतिक दुकान चला रहे ठाकरे ने राहुल-सोनिया के विर्द्धि इस तरह की टिप्पणी करके साबित कर दिया है कि वह स्वयं मतिभ्रम के शिकार हो रहे हैं। उनके लिए सिर्ड्ड यही कह सकते हैं कि अपनी अक्ल, अपनी कलम, अपना कागज, अपना अखबार और अपना घर, खूब लिखो, जो जी चाहे लिखो, छापो और खुश हो लो। बाल ठाकरे शिवसेना के मुखपत्र सामना के सम्पादक हैं। वह कभी खुद लिखते हैं, कभी उनके सम्पादकीय सहयोगी कालम दौड़ाते होंगे। सामना की सम्पादकीय को शिवसेना और बाल ठाकरे के विचार माना जाता है। मुंबई में सामना पढ़े जाने के दो कारण बताये जाते हैं। (एक) शिवसेना के समर्थक और बाल ठाकरे के अनुयायी इसे अधिक खरीदते हैं। (दो) दूसरा वर्ग उन लोगों का है जो बेलगाम कलम को पसंद करते हैं। सामना टाइप के अखबार और बाल ठाकरे शैली का लेखन उन लोगों को भी खूब भाती है जिन्हें हफ्ते में एकाध बार चाट-पकौड़ी ोणी की टिप्पणियां और खबरें पढऩे की लत हो। सुनने में आया है कि ठाकरे कार्टून अच्छे बना लेते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। मसलन, कार्टून बनाना, सम्पादकीय लिख लेना, घर में बैठकर राजनीति करना और अपनी कुण्ठाओं को लेखन के माध्यम से बाहर निकालना उम्र नब्बे के करीब पहुंचने को है, शरीर कभी-कभी परेशान करता है परंतु मस्तिष्क आवश्यकता से अधिक दौड़ता है। उनका लेखन उत्कृष्ट ोणी में नहीं कहा जा सकता। हां, वह लोगों का दिमाग अवश्य खराब कर सकता है। आश्चर्य होता है कि इस उम्र में शरीर भी ठीक-ठाक ढंग से साथ नहीं दे पा रहा फिर भी वह दूसरों की आलोचना करने तथा सियासी प्रतिद्वंद्वियों को नीचा दिखाने के लिए कहां से शब्द तलाश कर वाक्य बना लेते हैं। ९० फीसदी मामलों में यह उम्र वैराग्य की ओर ले जाती है। मोह छूटने लगता है तथा आलोचकों और शत्रुओं से सुलह को जी चाहता है। समझदार बुजुर्ग दूसरों, खासकर उम्र में अपने से छोटे लोगों के प्रति अपमानजनक शब्दों के प्रयोग से बचते हैं। इसकी वजह पलटवार की पीड़ा से बचना और परिपक् वता का आ जाना होता है। ठाकरे, दूसरी माटी के ही बने हैं। उन्हें दूसरों की छीछालेदर, प्रतिद्वंद्वियों का मानमर्दन और अपनी बात थोपने की कोशिशें ही राजनीति का आधार लगती हैं। बहरहाल, ठाकरे ने लिख लिया, लोगों ने उसका समाचार छापा और अन्य ने पढ़ लिया। यह तय है कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी ने ठाकरे की टिप्पणी को सहज भाव से ली है। वे जानते हैं कि विवाह में विलम्ब से कुछ व्यक्तियों को मति भ्रम हो जाता है, मगर पकी उम्र में कुछ लोगों की बुद्धि ही काम करना बंद कर देती है।


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