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वाईएसआर के दबाव में टीडीपी ने लिया गठबंधन में बने रहने का फैसला

नई दिल्ली (ईएमएस)। गृहमंत्री राजनाथ सिंह के फोन काल के बाद भाजपा-तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) गठबंधन के जारी गतिरोध खत्म हो गया है। फिलहाल दोनों पक्षों के बीच शांति कायम हो गई है। माना जा रहा है कि चंद्रबाबू नायडू के नर्म रुख के पीछे प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस की चुनौती का भी बहुत बड़ा योगदान है। चंद्रबाबू नायडू केंद्र के साथ अपनी शर्तों पर गठबंधन करने वाले नेता माने जाते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से लेकर यूपीए-दो कार्यकाल में उन्होंने अपने इस कौशल से सबको प्रभावित किया था। हालांकि, इस बार स्थितियां थोड़ी अलग हैं। केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार है। मुंबई के राजनीतिक गलियारों में भले ही इस बात का खंडन किया जा रहा हो, लेकिन सूत्रों का कहना है कि कुछ दिन पहले ही आंध्र के मुख्यमंत्री ने उद्धव ठाकरे से फोन पर बात की थी।

सूत्रों के अनुसार नायडू ने ठाकरे से अकेले 2019 लोकसभा चुनाव लड़ने के उनके फैसले पर लंबी चर्चा की। सूत्रों का कहना है कि ठाकरे ने टीडीपी प्रमुख को ‘वॉक द टॉक’ वाला फॉर्मूला समझाया। हालांकि, यहां टीडीपी की हालत एनडीए से गठबंधन तोड़ने को लेकर अलग है। नायडू की हालत दो चट्टानों के बीच फंसने जैसी हो गई और उनके लिए स्थिति काफी उलझन भरी थी। टीडीपी के अंदर भी भाजपा के साथ गठबंधन को लेकर असंतोष पैदा होने लगा है। टीडीपी के आंतरिक असंतोष का कारण यह है कि केंद्र सरकार राज्य के लिए किए वायदे पूरे करने में असफल रही है। इस वजह से जनता के बीच असंतोष पनप रहा है।

टीडीपी को राज्य में वाईएसआर कांग्रेस से भी कड़ी चुनौती मिल रही है। वाईएसआर प्रदेश के सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने में कामयाब रही है। आंध्र प्रदेश में इस वक्त वाईएसआर कांग्रेस ही मुख्य विपक्षी ताकत के तौर पर उभरी है। 2014 लोकसभा चुनावों में टीडीपी और कांग्रेस को संयुक्त तौर पर 47.71 फीसदी वोट शेयर मिले, जबकि वाईएसआर कांग्रेस का 45.38 फीसदी वोट शेयर रहा। ऐसे में 2.51 फीसदी के वोट शेयर का अंतर टीडीपी की चिंता बढ़ाने की वजह बन गया है। वाईएसआर कांग्रेस के मुखिया जगनमोहन रेड्डी पर केंद्रीय जांच एजेंसियों के कई केस चल रहे हैं। प्रदेश में ऐसी सुगबुगाहट है कि जगन भाजपा के साथ हो सकते हैं।

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