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‘न्यायपालिका पर लोगों की आस्था बनी!’

न्यायपालिका पर लोगों की आस्था बनी रहे कल कोई यह ना कहे कि हमने अपनी आत्मा बेच दी
इतिहास में पहली बार : जजों ने प्रेस कांफ्रेंस कर प्रमुख जज पर लगाए आरोप
जज बोले- हमारे पास कोई रास्ता नहीं बचा था इसलिए प्रेस के सामने आये
पिछले कुछ वर्षों से कोर्ट में नियमों का पालन नहीं हो रहा
केस के बटवारों में मनमानी और जजों की नियुक्ति को लेकर शिकायत

नई दिल्ली (ईएमएस)। सुप्रीम कोर्ट में पदस्थ 25 जजों में से चार प्रमुख जजों ने भारतीय इतिहास में वह कर दिया जो आजतक नहीं हुआ था। आजाद भारत में सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब लोकतंत्र के तीसरे स्तंभ (न्यायपालिका) को अपनी बात रखने के लिए चौथे स्तंभ (मीडिया) का सहारा लेना पड़ रहा है। चारों जजों ने शुक्रवार को एक पत्रकार वार्ता आयोजित की। जस्टिस चेलमेश्वर के घर पर यह पत्रकार वार्ता आयोजित हुई थी। इस पत्रकार वार्ता में जस्टिस गोगाई जस्टिस जोसेफ एवं जस्टिस लोकुर शामिल हुए। इन सभी चारों जजों ने मिलकर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (मुख्य जज) को एक पत्र सौंपते हुए न्यायपालिका की निष्ठा पर उठ रहे सवालों पर बातचीत की थी। किंतु मुख्य न्यायाधिपति हमारी कोई बातें नहीं सुनी, संतुष्टि नहीं मिलने के बाद हम लोगों के पास कोई विकल्प नहीं बचा था।
पत्रकार वार्ता में जस्टिस चेलमेश्वर एवं अन्य जजों ने कहा कि हम देश का कर्ज अदा कर रहे हैं। चीफ जस्टिस के बारे में देश के नागरिक फैसला करें। सुप्रीम कोर्ट में जिस तरह से जजों को कार्य आवंटित किया जा रहा है। जिस तरह से कार्य हो रहे हैं। उससे न्यायपालिका की निष्ठा पर सवाल उठ रहे हैं। आमतौर पर मीडिया से दूरी बनाकर रखने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज देश के इतिहास में पहली बार सामुहिक प्रेस कांफ्रेंस की। यह प्रेस कांफ्रेंस सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जज जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस कुरियन जोसेफ, और जस्टिस मदन लोकुर ने जस्टिस चेलमेश्वर के घर पर की। पत्रकारों से जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा कि हमने पिछले दिनों चीफ जस्टिस को चिट्ठी लिखी थी। इसमें एक केस को लेकर बात की गई है। उन्होंने कहा कि यह शिकायत पिछले दो महीनों के हालात को लेकर है। हमें लगता है कि कुछ ठीक नहीं चल रहा है। जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा कि हमने मिलकर चीफ जस्टिस को इस बात की जानकारी दी कि कुछ चीजें सही नहीं हैं और इसे ठीक करने के लिए कदम उठाए जाएं, लेकिन हमारी कोशिश असफल रही। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका पर लोगों की आस्था बनी रहे, कल कोई यह ना कहे कि हमने अपनी आत्मा बेच दी। हालांकि, जजेस ने यह साफ नहीं बताया कि मुद्दा क्या है, लेकिन कयास लगाए जा रहे हैं कि कोर्ट के चारों जजों के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा से मतभेद का मामला हो सकता है।
उन्होंने कहा कि हम नहीं चाहते कि 20 साल बाद कोई हम पर न्यायपालिका की गरिमा को लेकर आरोप लगाए। पत्रकारों के सामने हाथ जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का प्रशासन सही तरीके से काम नहीं कर रहा है। जिसके कारण यह स्थिति बन रही है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और जजों के बीच सार्वजनिक रूप से यह टकराव पहली बार देश को देखने को मिला है। पिछले कई महीनों से सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली को लेकर केंद्र सरकार एवं अन्य लोंगो ने न्यायपालिका की विश्वसनीयता को लेकर तरह-तरह की बातें सार्वजनिक रूप से हो रही हैं। जिस तरह से जस्टिस चेलमेश्वर, जो सुप्रीम कोर्ट में नंबर 2 के वरिष्ठ जज हैं। उनके साथ तीन जजों द्वारा सार्वजनिक रूप से प्रेस कांफ्रेंस करके अपनी बात कहने से न्यायपालिका के अंदर जो बातें अभी लुके-छुपे चल थी। वह पहली बार खुलकर सामने आई हैं। यह एक बहुत बड़ा विस्फोट न्यायपालिका का माना जा रहा है।
प्रमुख जज बोले
प्रेस कांफ्रेंस के बाद मुख्य जज ने एटॉर्नी जनरल से चर्चा की। रात में मुख्य जज का बयान सामने आया जिसमें उन्होंने कहा- सुप्रीम कोर्ट के लिए सभी जज बराबर हैं। कोर्ट में सभी केसों का सही बटवारा किया जाता है।
सरकार तक सनसनी
प्रेस कांफ्रेंस की खबर सुनते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद से फोन पर बात की।
राहुल का संयमित बयान
सहीं तरीके से हो जस्टिस लोया की मौत की जांच
जस्टिस लोया की मौत की सही तरीके से जांच हो। राहुल ने कहा कि हमें न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा है। वहीं, कांग्रेस के अन्य नेताओं ने कहा कि न्यायपालिका पर केंद्र सरकार का दखल तेजी से बढ़ा है।
दीपक /१२ जनवरी २०१८

टूटा अनुशासन : निकम
प्रसिद्ध वकील उज्जवल निकम बोले- जजों के ऐसे वर्ताव से बड़ा अनुशासन टूट गया, उन्हें कोई और रास्ता अपनाना चाहिए था।

पहले भी न्यायपालिका पर उठे हैं सवाल

1983: 3 जजों ने इस्तीफा दिया था
भाजपा के फायरब्रांड नेता और सांसद सुब्रहमण्यम स्वामी ने कहा कि अगर जजों ने शिकायत की है तो उनके मन में कोई न कोई पीड़ा जरूर होगी। स्वामी ने बताया कि इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों ने इस्तीफा दे दिया था। हालाकि वे प्रेस के सामने नहीं आये थे।

भ्रष्टाचार के आरोप लगाए तो हाई कोर्ट के जज को ही जेल भेज दिया
कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस सीएस कर्णन हाल ही में 6 महीने की जेल काटकर बाहर आये हैं। कर्णन वे जज हैं जिन्होंने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर 20 जजों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने की शिकायत की थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने किसी हाईकोर्ट के सिटिंग जज के खिलाफ अवमानना का नोटिस जारी किया। जस्टिस सी एस कर्णन ने भारत के चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट के 7 अन्य जजों को 5 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी।
कर्णन ने आरोप लगाये थे कि खेहर (तात्कालीन मुख्य जज) का झुकाव सवर्णों की ओर है और वह दलित विरोधी हैं। इसे बाद न्यायालय की अवमानना मामले में उन्हें 6 महीने की जेल काटनी पड़ी।

तबादले से परेशान जज ने दिया इस्तीफा
सितंबर 2017 में कर्नाटक हाईकोर्ट के जज जयंत एम पटेल ने अपने तबादले से परेशान होकर इस्तीफा दे दिया था। पटेल वही जज हैं जिन्होंने इशरत जहां मुठभेड़ मामले में सीबीआई जांच का आदेश दिया था। अभी उनके रिटायर होने में करीब 10 महीने बचे थे, लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि उनका तबादला इलाहाबाद किया जा रहा है, उन्होंने इस्तीफा दे दिया। तबादले पर यह भी कहा जा रहा था कि इशरत जहां मुठभेड़ केस की वजह से ही उनका तबादला किया जा रहा है. हालांकि, खुद जयंत ने ऐसा कुछ नहीं कहा।

हाई कोर्ट के सामने हड़ताल पर बैठे, निलंबन मिला
अगस्त 2017 में मध्यप्रदेश के जबलपुर में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश आरके श्रीवास तबादले से परेशान होकर धरने पर बैठ गए थे। श्रीवास ने आरोप मढ़ा था कि 15 महीनों के अंदर ही उनका 4 बार तबादला किया गया है। जबलपुर उच्च न्यायालय के इतिहास में भी ऐसा पहली बार हुआ था, जब कोई जज धरने पर बैठा था। उनका आरोप था कि न्याय व्यवस्था में बैठे कुछ लोग मनमाने तरीके से काम कर रहे हैं।
दीपक राय, १२ जनवरी, २०१८

लीड खबर… न्यायपालिका पर लोगों की आस्था बनी रहे, कल कोई यह ना कहे कि हमने अपनी आत्मा बेच दी
इतिहास में पहली बार : जजों ने प्रेस कांफ्रेंस कर प्रमुख जज पर लगाए आरोप
जज बोले- हमारे पास कोई रास्ता नहीं बचा था इसलिए पे्रस के सामने आये
पिछले कुछ वर्षों से कोर्ट में नियमों का पालन नहीं हो रहा
केस के बटवारों में मनमानी और जजों की नियुक्ति को लेकर शिकायत

नई दिल्ली (ईएमएस)। सुप्रीम कोर्ट में पदस्थ 25 जजों में से चार प्रमुख जजों ने भारतीय इतिहास में वह कर दिया जो आजतक नहीं हुआ था। आजाद भारत में सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब लोकतंत्र के तीसरे स्तंभ (न्यायपालिका) को अपनी बात रखने के लिए चौथे स्तंभ (मीडिया) का सहारा लेना पड़ रहा है। चारों जजों ने शुक्रवार को एक पत्रकार वार्ता आयोजित की। जस्टिस चेलमेश्वर के घर पर यह पत्रकार वार्ता आयोजित हुई थी। इस पत्रकार वार्ता में जस्टिस गोगाई जस्टिस जोसेफ एवं जस्टिस लोकुर शामिल हुए। इन सभी चारों जजों ने मिलकर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (मुख्य जज) को एक पत्र सौंपते हुए न्यायपालिका की निष्ठा पर उठ रहे सवालों पर बातचीत की थी। किंतु मुख्य न्यायाधिपति हमारी कोई बातें नहीं सुनी, संतुष्टि नहीं मिलने के बाद हम लोगों के पास कोई विकल्प नहीं बचा था।
पत्रकार वार्ता में जस्टिस चेलमेश्वर एवं अन्य जजों ने कहा कि हम देश का कर्ज अदा कर रहे हैं। चीफ जस्टिस के बारे में देश के नागरिक फैसला करें। सुप्रीम कोर्ट में जिस तरह से जजों को कार्य आवंटित किया जा रहा है। जिस तरह से कार्य हो रहे हैं। उससे न्यायपालिका की निष्ठा पर सवाल उठ रहे हैं। आमतौर पर मीडिया से दूरी बनाकर रखने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज देश के इतिहास में पहली बार सामुहिक प्रेस कांफ्रेंस की। यह प्रेस कांफ्रेंस सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जज जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस कुरियन जोसेफ, और जस्टिस मदन लोकुर ने जस्टिस चेलमेश्वर के घर पर की। पत्रकारों से जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा कि हमने पिछले दिनों चीफ जस्टिस को चिट्ठी लिखी थी। इसमें एक केस को लेकर बात की गई है। उन्होंने कहा कि यह शिकायत पिछले दो महीनों के हालात को लेकर है। हमें लगता है कि कुछ ठीक नहीं चल रहा है। जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा कि हमने मिलकर चीफ जस्टिस को इस बात की जानकारी दी कि कुछ चीजें सही नहीं हैं और इसे ठीक करने के लिए कदम उठाए जाएं, लेकिन हमारी कोशिश असफल रही। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका पर लोगों की आस्था बनी रहे, कल कोई यह ना कहे कि हमने अपनी आत्मा बेच दी। हालांकि, जजेस ने यह साफ नहीं बताया कि मुद्दा क्या है, लेकिन कयास लगाए जा रहे हैं कि कोर्ट के चारों जजों के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा से मतभेद का मामला हो सकता है।
उन्होंने कहा कि हम नहीं चाहते कि 20 साल बाद कोई हम पर न्यायपालिका की गरिमा को लेकर आरोप लगाए। पत्रकारों के सामने हाथ जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का प्रशासन सही तरीके से काम नहीं कर रहा है। जिसके कारण यह स्थिति बन रही है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और जजों के बीच सार्वजनिक रूप से यह टकराव पहली बार देश को देखने को मिला है। पिछले कई महीनों से सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली को लेकर केंद्र सरकार एवं अन्य लोंगो ने न्यायपालिका की विश्वसनीयता को लेकर तरह-तरह की बातें सार्वजनिक रूप से हो रही हैं। जिस तरह से जस्टिस चेलमेश्वर, जो सुप्रीम कोर्ट में नंबर 2 के वरिष्ठ जज हैं। उनके साथ तीन जजों द्वारा सार्वजनिक रूप से प्रेस कांफ्रेंस करके अपनी बात कहने से न्यायपालिका के अंदर जो बातें अभी लुके-छुपे चल थी। वह पहली बार खुलकर सामने आई हैं। यह एक बहुत बड़ा विस्फोट न्यायपालिका का माना जा रहा है।

प्रमुख जज बोले
प्रेस कांफ्रेंस के बाद मुख्य जज ने एटॉर्नी जनरल से चर्चा की। रात में मुख्य जज का बयान सामने आया जिसमें उन्होंने कहा- सुप्रीम कोर्ट के लिए सभी जज बराबर हैं। कोर्ट में सभी केसों का सही बटवारा किया जाता है।

सरकार तक सनसनी
प्रेस कांफ्रेंस की खबर सुनते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद से फोन पर बात की।

राहुल का संयमित बयान
सहीं तरीके से हो जस्टिस लोया की मौत की जांच
जस्टिस लोया की मौत की सही तरीके से जांच हो। राहुल ने कहा कि हमें न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा है। वहीं, कांग्रेस के अन्य नेताओं ने कहा कि न्यायपालिका पर केंद्र सरकार का दखल तेजी से बढ़ा है।

टूटा अनुशासन : निकम
प्रसिद्ध वकील उज्जवल निकम बोले- जजों के ऐसे वर्ताव से बड़ा अनुशासन टूट गया, उन्हें कोई और रास्ता अपनाना चाहिए था।

पहले भी न्यायपालिका पर उठे हैं सवाल

1983: 3 जजों ने इस्तीफा दिया था
भाजपा के फायरब्रांड नेता और सांसद सुब्रहमण्यम स्वामी ने कहा कि अगर जजों ने शिकायत की है तो उनके मन में कोई न कोई पीड़ा जरूर होगी। स्वामी ने बताया कि इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों ने इस्तीफा दे दिया था। हालाकि वे प्रेस के सामने नहीं आये थे।

भ्रष्टाचार के आरोप लगाए तो हाई कोर्ट के जज को ही जेल भेज दिया
कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस सीएस कर्णन हाल ही में 6 महीने की जेल काटकर बाहर आये हैं। कर्णन वे जज हैं जिन्होंने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर 20 जजों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने की शिकायत की थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने किसी हाईकोर्ट के सिटिंग जज के खिलाफ अवमानना का नोटिस जारी किया। जस्टिस सी एस कर्णन ने भारत के चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट के 7 अन्य जजों को 5 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी।
कर्णन ने आरोप लगाये थे कि खेहर (तात्कालीन मुख्य जज) का झुकाव सवर्णों की ओर है और वह दलित विरोधी हैं। इसे बाद न्यायालय की अवमानना मामले में उन्हें 6 महीने की जेल काटनी पड़ी।

तबादले से परेशान जज ने दिया इस्तीफा
सितंबर 2017 में कर्नाटक हाईकोर्ट के जज जयंत एम पटेल ने अपने तबादले से परेशान होकर इस्तीफा दे दिया था। पटेल वही जज हैं जिन्होंने इशरत जहां मुठभेड़ मामले में सीबीआई जांच का आदेश दिया था। अभी उनके रिटायर होने में करीब 10 महीने बचे थे, लेकिन जैसे ही उन्हें पता चला कि उनका तबादला इलाहाबाद किया जा रहा है, उन्होंने इस्तीफा दे दिया। तबादले पर यह भी कहा जा रहा था कि इशरत जहां मुठभेड़ केस की वजह से ही उनका तबादला किया जा रहा है. हालांकि, खुद जयंत ने ऐसा कुछ नहीं कहा।

हाई कोर्ट के सामने हड़ताल पर बैठे, निलंबन मिला
अगस्त 2017 में मध्यप्रदेश के जबलपुर में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश आरके श्रीवास तबादले से परेशान होकर धरने पर बैठ गए थे। श्रीवास ने आरोप मढ़ा था कि 15 महीनों के अंदर ही उनका 4 बार तबादला किया गया है। जबलपुर उच्च न्यायालय के इतिहास में भी ऐसा पहली बार हुआ था, जब कोई जज धरने पर बैठा था। उनका आरोप था कि न्याय व्यवस्था में बैठे कुछ लोग मनमाने तरीके से काम कर रहे हैं।
दीपक राय, १२ जनवरी, २०१८

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