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कर्ज से पूर्ण मुक्ति और फसल का लाभकारी दाम सुनिश्चित हो

  • किसान मुक्ति संसद ने पास किए दो प्रस्ताव
  • बड़ी संख्या में महिलाओं ने किया शिरकत
  • मांग नहीं मानी तो गांवों में घुसने नहीं देंगे

नई दिल्ली(ईएमएस)। देशभर के किसानों ने समस्याओं को लेकर राजधानी दिल्ली में किसान मुक्ति संसद सम्मेलन का आयोजन किया। इसमें देश के करीब 184 किसान संगठनों ने हिस्सा लिया, वहीं महिला संसद में देशभर से आई करीब 6 सौ महिलाओं ने भी हिस्सेदारी की। इस दौरान किसानों ने सर्वसम्मति से दो प्रस्ताव पास किए, जिन्हें किसान सम्मेलन ने विधेयक कहकर प्रस्तुत किया है। इन प्रस्तावों में कर्ज से पूर्ण मुक्ति और कृषि उपजों का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करना प्रमुख है। इसके साथ ही किसानों ने अल्टीमेटम दे दिया है कि मांग नहीं मानी गईं तो आगामी लोकसभा चुनाव में नेताओं को वोट मांगने के लिए गांवों में घुसने नहीं दिया जाएगा।

देश में कृषि क्षेत्र की समस्याओं को उजागर करने के लिए राजधानी दिल्ली में आयोजित किसान मुक्ति संसद सम्मेलन में किसानों को कर्ज के बोझ से पूर्ण मुक्ति दिलाने और कृषि उपजों का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने संबंधी दो प्रस्ताव पारित किए गए। इन प्रस्तावों को किसान संगठनों ने के सम्मेलन ने विधेयक का नाम दिया है। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) के तत्वावधान में आयोजित इस विशाल सम्मेलन में देश भर से किसान आए थे। बताया गया है कि समन्वय समिति में संपूर्ण देश के 184 किसान संगठन शामिल हुए हैं। इसी बीच महिला किसानों की संसद भी सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर की अध्यक्षता में संपन्न हुई।

महिला संसद में देशभर से करीब 545 महिलाओं शिरकत की। किसान मुक्ति संसद में हिस्सा लेने वाले किसान संगठनों ने घोषणा की है कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो 2019 के लोकसभा चुनाव में वोट मांगने के लिए नेता गांवों में प्रवेश नहीं कर पाएंगे। इस बात को लेकर किसानों में आमसहमति है कि चुनाव के दौरान नेताओं से उनके काम-काज का हिसाब लिया जाएगा और वोट मांगने आने वाले सरकार में शामिल सांसदों से पूछा जाएगा कि उन्होंने संसद में किसानों के हित में क्या किया।

समर्थन मूल्य से कम में नहीं बिकने देंगे फसल

किसान मुक्ति संसद को संबोधित करते हुए स्वराज अभियान के योगेन्द्र यादव ने कहा कि देश में अब कहीं भी समर्थन मूल्य से कम कीमत पर फसलों को बिकने नहीं दिया जाएगा। उन्होंने सरकारों पर निशाना साधते हुए इशारों में ही कहा कि किसानों को ठगने का काम बहुत हुआ अब किसान जाग गए हैं और वो अपना हक लेकर रहेंगे। इस प्रकार जिन राज्यों में समर्थन मूल्य से कम में खरीदी का काम किया जा रहा है उसका विरोध करते हुए समर्थन मूल्य में फसल बिक्री सुनिश्चित करने की बात भी उन्होंने कही।

भाषाएं अलग लेकिन दर्द सभी का एक

देशभर के करीब 184 किसान संगठनों से जुड़े किसान जब राजधानी दिल्ली में जुटे तो उन्होंने अपने-अपने दर्द को साझा किया। यहां विभिन्न प्रांतों में बोली जाने वाली भाषाओं और बोलियों में खासा भेद नजर आया, लेकिन सभी किसानों का दर्द लगभग एक ही समान था और वह कर्ज और फसल की उचित लागत नहीं मिलने से ही संबंधित था। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और गुजरात के साथ ही दक्षिण के आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल समेत लगभग सभी राज्यों के किसान अपनी भाषा में दर्द बयान करते नजर आए। देश भर से आए किसानों ने अपनी-अपनी भाषाओं में सरकार विरोधी बैनर-पोस्टर भी यहां लगाए।

दु:खड़ा सुन गमगीन हुए सभी

किसान महिला संसद में शरीक होने आईं महिलाओं ने जब अपना दुखड़ा सुनाया तो वहां मौजूद तमाम लोगों की आंखें भर आईं। दरअसल इन महिलाओं में अधिकांश महिलाएं उन परिवारों से थीं जिनके मुखिया या सगे-संबंधी कर्ज के कारण आत्महत्या कर चुके हैं। इस प्रकार देश भर से आत्महत्या करने वाले परिवारों से आई इन महिलाओं ने जब अपनी पारिवारिक स्थिति और परेशानियों को संसद के सामने रखा तो संसद मार्ग पर जुटी हजारों किसानों की भीड़ गमगीन हो गई। इसी बीच महिलाओं ने दृढ़प्रतिज्ञ होकर कहा कि अब किसान आत्महत्या नहीं करेंगे बल्कि संघर्ष करेंगे। यहां उन्होंने कहा कि उन्हें पहली बार यह अहसास हुआ है कि उनकी बात सुनने वाला भी कोई है।

2019 में बने किसान हितैशी सरकार

राजधानी दिल्ली में जुटे आखिल भारतीय किसान समनवय समिति के नेता, संयोजक वीएम सिंह, योगेंद्र यादव, सांसद राजू शेट्टी, डॉ. सुनीलम, भाकपा नेता व अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय महासचिव अतुल कुमार अंजान, सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटेकर समेत अनेक नेताओं ने किसानों से आव्हान करते हुए कहा कि सभी लोग आज यह प्रतिबद्ध करें कि आगामी 2019 के लोकसभा चुनाव में एक ऐसी सरकार बने जो सही मायने में किसान हितैशी हो। यहां कहा गया कि आज किसानों को वो काम करना पड़ रहा है जो कि सरकारों को करना चाहिए था। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये सरकारें किसानों के साथ नाइंसाफी करती चली आ रही हैं।

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