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बैंलेंस शीट नहीं, अब कैश फ्लो देख कर लोन देगा एसबीआई

मुंबई (ईएमएस)। देश का सबसे बड़ा बैंक एसबीआई छोटी कंपनियों को जिस नजरिए से लोन बांटता है, उसमें बड़ा बदलाव आ रहा है। बैंक अब लोन बांटने का फैसला करते वक्त इन कंपनियों की बैलेंसशीट के बजाय बैंक स्टेटमेंट चेक करने लगा है। बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि लोन मांगने वाली कंपनी के पास चुकाने लायक कैश फ्लो है भी या नहीं। हम उनके एक साल का बैंक बैलेंस देखते हैं और उसका मिलान उनकी बैलेंसशीट से करते हैं।

बैंक फिलहाल लोन मांगने वाली छोटी और मझोली कंपनियों के कैश फ्लो देख रहा है, लेकिन अंत में वह बड़ी कंपनियों के लिए भी यही तरीका अपनाएगा। एक वरिष्ठ बैंक अधिकारी ने बताया बुनियादी तौर पर हमारा ध्यान बॉरोअर के उधार चुकाने की क्षमता को आंकने पर होगा। एसबीआई ने बैड लोन के लगातार बढ़ते बोझ को कम करने के लिए यह कदम उठाया है।

इसी साल जून में आरबीआई की तरफ से जारी फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च 2017 का कमर्शियल बैंकों का ग्रॉस नॉन परफॉर्मिंग लोन बांटे गए टोटल लोन का 9.6 पर्सेंट था। रिपोर्ट में यह भी लिखा था कि उनका ग्रॉस एनपीए मार्च 2018 तक 10.2 पर्सेंट हो सकता है। बैंकों का लोन वापस चुकाने में नाकाम साबित हो रहे ज्यादातर बॉरोअर्स का कहना है कि उनकी यह हालत प्रोजेक्ट्स को पूरा करने के लिए जरूरी सरकारी मंजूरी मिलने में देरी की वजह से हुई है। कुछ कंपनियों पर इसलिए लोन का बोझ बहुत ज्यादा हो गया है, क्योंकि उन्होंने कई कारोबार में पैर पसार लिया था। कुछ कंपनियां ऐसी भी हैं जो अपने प्रॉडक्ट्स की डिमांड घट जाने की वजह से मुसीबत में फंस गई हैं।

एसबीआई के दूसरे अफसर ने बताया कि उनका बैंक अब लोन बांटते समय कंपनी की कारोबार फैलाने के क्षमता के बजाय उसकी नकदी हासिल करने की क्षमता देख रहा है। उन्होंने कहा पूंजी तो बन ही जाती है, लेकिन लोन चुकाने के लिए तो कैश की जरूरत होती है। इसलिए हम अब कंपनियों के ईबीआईटीए (इंटरेस्ट, टैक्स और अमॉर्टाइजेशन की प्रोविजनिंग से पहले की आमदनी) पर ध्यान देने लगे हैं।

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