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प्रोजेरिया का इलाज मिला

प्रोजेरिया एक ऐसी बीमारी है जिसमें बचपन में ही बुढ़ा़पा आने लगता है और इस बीमारी से ग्रस्त लोगों की उम्र बेहद कम होती है और करीब बीस साल तक की आयु में मौत हो जाती है। इसके कारणों का पक्के तौर पर तो नहीं पता चला है पर यह जीन में गड़बड़ी से होती है। इस आनुवांशिक बीमारी में बच्चों का शरीर तेजी से बूढ़ा होने लगता है। इससे पीड़ित अधिकतर बच्चों की उम्र 13 साल से ज्यादा नहीं होती है।

हालांकि यह काफी दुर्लभ बीमारी है, जो 40 लाख बच्चों में से किसी एक को होती है। यह बीमारी जीन में गड़बड़ी पर कोशिकाओं द्वारा ‘प्रोजेरिन’ प्रोटीन का अवशोषण करने पर होती है। अब एक नये अध्ययन से अब इस बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए राहत की खबर है।

वैज्ञानिकों ने बच्चों को कम उम्र में ही बूढ़ा बनाने वाले प्रोजेरिया रोग का इलाज ढूढ़ निकाला है। मानव कोशिकाओं के उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा कर और उन्हें दोबारा जवान बनाकर इस रोग पर काबू पाया जा सकता है। अमेरिका स्थित ह्यूस्टन मेथोडिस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने प्रोजेरिया पीड़ित बच्चे की कोशिकाओं का अध्ययन किया। शोध टीम में शामिल विशेषज्ञों ने कहा कि हम इस अध्ययन से पीड़ित बच्चों को सामान्य जिंदगी देने की कोशिश कर रहे हैं।

अगर हम उनके कोशिकाओं के कार्य में बदलाव कर सकें तो ऐसे बच्चों को दोबारा लंबी उम्र दिया जाना संभव हो सकेगा। उन्होंने कहा कि हमारा पूरा ध्यान कोशिकाओं में पाए जाने वाले टीलोमीयर्स पर है। ये प्रत्येक गुणसूत्र के नोक पर स्थित होते हैं, जो गुणसूत्रों को आपस में जोड़े रखते हैं। जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती जाती है, ये टीलोमीयर्स छोटे होते जाते हैं। इसी तरह प्रोजेरिया से पीड़ित बच्चों में ये टीलोमीयर्स काफी तेजी से छोटे होते हैं।

कुक ने बताया कि जब हमने कोशिकाओं में टीलोमीयर्स के छोटे होने की प्रक्रिया को उल्टा किया और उसकी लंबाई बढ़ाई तो उम्र बढ़ने संबंधी कई समस्याओं का समाधान सामने आया। इसके बाद कोशिकाओं ने सामान्य तरीके से काम करना शुरू कर दिया और उनकी आयु सीमा भी बढ़ गई। यह बेहद हैरत में डालने वाली खोज थी।

शोधार्थियों ने इस प्रक्रिया के लिए राइबोन्यूक्लिक एसिड (आरएनए) चिकित्साशास्त्र तकनीक का सहारा लिया। उन्होंने एक कोशिका से टीलोमेरेज प्रोटीन को निकाला, जो टीलोमीयर्स की लंबाई बढ़ाने में मदद करता है। इस प्रोटीन को प्रोजेरिया पीड़ित कोशिकाओं में कुछ दिनों के लिए डाला गया, जिसके बाद उसकी कार्यक्षमता सामान्य हो गई और उम्र भी बढ़ी नजर आई। इस तकनीक के इस्तेमाल के बाद देखा गया कि प्रोजेरिया पीड़ित कोशिकाओं का विभाजन भी बढ़ने लगा। साथ ही ये ज्वलनशील प्रोटीन का निर्माण भी करने लगे, जो कोशिकाओं की बढ़ती उम्र को दर्शाता है।

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