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मालदीव में हो सीधी कार्रवाई

लेखक-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

मालदीव के भूतपूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद के अब दस दिन पूरे होने को हैं। वे मालदीव स्थित हमारे राजदूतावास में शरण लिए हुए हैं। मालदीव के न्यायालय वारंट पर वारंट जारी किए जा रहे हैं। मालदीव सरकार की मजबूरी है कि भारतीय राजदूतावास में घुसकर वह नशीद को पकड़कर अदालत के सामने पेश नहीं कर सकती। अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार किसी भी दूतावास पर उस देश का घरेलू कानून लागू नहीं होता। और फिर भारत जैसे पड़ौसी देश के दूतावास पर मालदीव जोर-जबरदस्ती कैसे कर सकता है।

मालदीव सरकार से ज्यादा परेशानी भारत सरकार को है। भारत ने अब तक ऐसी घटना का सामना पहले कभी नहीं किया। १९५० में नेपाल नरेश त्रिभुवन और उनके परिवार को भारतीय दूतावास ने शरण जरुर दी थी लेकिन उन्हें तुरंत ही दिल्ली पठा दिया था। लेकिन अभी भारत सरकार को यह पता ही नहीं कि नशीद आखिर कितने दिनों तक उसके दूतावास के मेहमान बने रहेंगे। वे कोई ऐसे-वैसे अपराधी नहीं है। वे जनता द्वारा चुने हुए अभूतपूर्व पूर्व राष्ट्रपति रहे हैं। वे भारत के मित्र माने जाते हैं। उन्होंने कोई हत्या या डकैती या गबन-जैसी हरकत भी नहीं की है। उन पर आरोप है कि उन्होंने राष्ट्रपति के पद पर रहते हुए मालदीव की फौजदारी अदालत के सर्वोच्च न्यायाधीश को गैर-कानूनी ढंग से गिरफ्तार कर लिया था।

अपदस्थ राष्ट्रपति पर यह मुकदमा चले और चलता रहे तो इसमें भी आपत्ति की कोई बात नहीं है लेकिन इस मुकदमे के पीछे खेल गहरा है। उस गहराई को नशीद अच्छी तरह समझते हैं, इसीलिए वे अदालत के सामने पेश होने से भी बच रहे हैं। उन्हें पता है कि उन्हें गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया जाएगा। यदि वे एक साल जेल में रह लिये तो फिर मालदीव के कानून के मुताबिक वे राष्ट्रपति का चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। सितंबर में होनेवाले राष्ट्रपति के चुनाव में उनके लौटने की संभावना ने वर्तमान राष्ट्रपति और उनके मार्गदर्शकों की नींद हराम कर रखी है।

भारत सरकार क्या, कोई भी सरकार अपने दूतावास में शरण लिये हुए किसी पूर्व राष्ट्राध्यक्ष को प्रायः धक्का नहीं देती लेकिन मालदीव की वहीद मानिक की सरकार भारत सरकार को आंखें दिखा रही है। मालदीव के विदेश मंत्री अब्दुल अब्दुल्ला भारत के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद से जबर्दस्त आग्रह कर रहे हैं कि वे नशीद को उनके हवाले कर दें। वे बरबार आश्वासन दे रहे हैं कि नशीद को कुछ नहीं होगा। उन्हें सिर्फ अदालत में पेश कर दिया जाएगा। यह आश्वासन इस बात का प्रमाण है कि अदालत का निर्णय सरकार पहले से जानती है या उसने पहले से अदालत को यही कह रखा है। किसे पता है कि सरकार ने इसका उलटा ही पहले से तय कर रखा हो? जब नशीद ने एक वारंट की तामील नहीं की तो उन पर दूसरा थोप दिया गया। उसकी भी मियादं खत्म हुई। अब क्या होगा?

यह मामला सिर्फ नशीद की शरण का ही नहीं है, पूरे साल भर से चली आ रही हमारी ढीली-पोली नीति का है। हम जरुरत से ज्यादा सावधान हैं, संकोची हैं बल्कि संभ्रम में हैं। जब फरवरी २०१२ में नशीद का तख्ता-पलट हुआ तो हमारी सरकार का माथा माले के घटना-चक्र के साथ ही घूम गया। उसने दो-तीन दिन भी प्रतीक्षा नहीं की। नशीद के हड़बड़ी में दिए गए इस्तीफे को उसने सहज-सरल इस्तीफा मान लिया और नशीद के उप-राष्ट्रपति वहीद मानिक को तुरंत बधाई दे दी। यह ठीक है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके तत्कालीन विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा विदेशी मामलों को जरा मुश्किल से समझते हैं लेकिन भारत जैसे विशाल राष्ट्र की सरकार चलाते हुए इतना सामान्य-ज्ञान तो हमारे नेताओं को होना ही चाहिए कि वे सही समय पर अपने अफसरों को सही सवाल पूछ सकें। वे चाहते तो हारी हुई बाजी भी जीत सकते थे। वहीद को राष्ट्रपति मानने के पहले वे उनसे तुरंत चुनाव का वादा ले लेते, माले में अंतरिम सरकार बन जाती और सारा मामला शांतिपूर्ण ढंग से हल हो जाता।

भारत सरकार की ढुलमुल नीति के कारण वहीद जैसे निराधार नेता की महत्वाकांक्षा सर्पनाश बन गई। नशीद अगर मेहरबान होकर चुनाव में वहीद को अपना सहायक भागीदार नहीं बनाते तो वे उप-राष्ट्रपति चुने जाने के बजाय किसी बैंक-वैंक में नौकरी कर रहे होते। वहीद ने अपनी पार्टी भी खड़ी कर ली है। उसके सिर्फ तीन हजार सदस्य हैं। संसद में उसका एक भी सदस्य नहीं है। लेकिन उनके पीछे मालदीव के पूर्व तानाशाह मामून अब्दुल गय्यूम ने अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है। गय्यूम की पार्टी और अन्य मजहबी पार्टियों से मिलकर वहीद ने अपना मंत्रिमंडल खड़ा कर लिया है। गय्यूम के बेटे और बेटी श्दुनियाश् को मंत्री बना दिया गया है। वहीद ने अपने बॉस नशीद को अब देशद्रोही, रिश्वतखोर और भारत का दलाल साबित करने का अभियान चला रखा है। अब वे तुरंत चुनाव क्यों कराते? साल भर तो उन्होंने काट ही लिया। अब वे सितंबर तक का समय भी आसानी से काट लेंगे। भारत द्वारा पिछले साल तख्ता-पलट के बाद भेजे गए भारतीय विशेष दूत को वहीद ने खाली हाथ चलता कर दिया था और फिर खुद भारत-यात्रा करके हमारे नेताओं को कई सब्ज-बाग दिखा गए थे।

इस बीच उनकी सरकार ने भारत की कंपनी जीएमआर को भी कठघरे में खड़ा कर दिया और उसके हाथ से माले हवाई अड्डे का नियंत्रण छीन लिया। राष्ट्रपति के प्रवक्ता ने भारतीय राजदूत को गद्दार और मालदीव का दुश्मन तक कहा। मालदीव के विदेश मंत्री इस बीच चीन भी हो आए। नशीद की शरण के बाद अभी-अभी भेजे गए हमारे प्रतिनिधि मंडल से राष्ट्रपति ने मिलने से भी मना कर दिया।
ऐसी स्थिति में भारत क्या करे? यदि वह नशीद को दूतावास के बाहर निकाल देगा तो वे निश्चय ही गिरफ्तार हो जाएंगे। सारे संसार में भारत की छवि भी खराब होगी। जरुरी यही है कि गय्यूम और वहीद को दृढ़तापूर्वक समझाया जाए और उनसे तुरंत चुनाव का आग्रह किया जाए। उन्हें यह साफतौर पर बताया जाए कि भारत किसी नेता या पार्टी का पक्षधर नहीं है लेकिन वह लोकतंत्र का पक्षधर है। वहीद (और गय्यूम) की सरकार लोकतंत्र के जरिए बने तो भारत को कोई एतराज नहीं है लेकिन अगर वे कट्रटरपंथी और तानाशाही तत्वों से मिलकर लोकतंत्र का गला दबाने की कोशिश करेंगे तो भारत इसे मालदीव का आंतरिक मामला नहीं मानेगा। जैसे १९७१ में उसने पहले श्रीलंका में श्रीमावो बंदारनायक और पूर्वी पाकिस्तान में शेख मुजीब के लोकतंत्र को बचाने के लिए गंभीर कदम उठाए थे, वैसे ही वह मालदीव में भी उठाएगा। यदि इस संकेत पर भी वहीद सरकार ठीक राह न पकड़े तो भारत सरकार को मालदीव पर इंदिरा सिद्घांत लागू करने की तैयारी जोर-शोर से शुरु कर देनी चाहिए। १९८८ में राष्ट्रपति गय्यूम का तख्ता उलटनेवालों को मार भगानेवाले भारत की क्षमता से वहीद और स्वयं गय्यूम सुपरिचित हैं ही!

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